Monday, April 20, 2015

किनवार कुल के बड़े भाई के वंशज 
मंगल पांडे
देश की आजादी की पहली लड़ाई के नायक मंगल पांडे किसी परिचय के मोहताज नहीं हैं। लकिन कष्ट तब होता है जब उनको लेकर ब्राह्मणों और भूमिहारों में अक्सर विवाद उठ खड़ा होता है। भूमिहार-ब्राह्मण उन्हें भूमिहार घोषित करते हैं जबकि ब्राह्मणों की नजर में वो ब्राह्मण ही थे। जबकि सच्चाई ये है कि दोनों के दावे अपनी जगह बिल्कुल सही हैं। ये सही है कि मंगल पांडे ने एक ब्राह्मण परिवार में जन्म लिया था लेकिन उनकी धमनियों में भी वही रक्त प्रवाहित हो रहा था जो दक्षिण भारत में तेरह पीढ़ियो तक भगवान परशुराम के “अग्रतश्चतुरो वेदा: पृष्ठत: सशरं धनु:। इदं ब्राम्हं इदं क्षात्रं शापादपि शरादपि॥“ मंत्र से दीक्षित होकर राज्य और धर्म की कीर्ति पताका को फहराने वाले किनवार ब्राह्मणों के । लेकिन दक्षिण भारत में चेर और चोल वंश के बीच चले लंबे संघर्ष के बाद जब वहां के राजा ‘शिवरमन पेरुमल’ ने राजपाट 14 ब्राह्मणों की एक समिति को सौंपकर तीर्थ के लिए हिमालय प्रस्थान करने का निर्णय लिया तब उनके राजामात्य अमोघ दीक्षित भी उनके साथ काशी के लिए चल पड़े। केरल के इतिहास में ये साल सन् 1122 दर्ज है। किनवार वंशावली में भी उनके काशी आगमन का वर्ष सन् 1122 लिखा है।  



‘अमोघ दीक्षित’ के बेटे ‘त्रिलोचन दीक्षित’ के चार पुत्रों में मुनि दीक्षित सबसे बड़े थे। मूल्हन दीक्षित दूसरे नंबर पर और उनसे छोटे थे। लेकिन हम लोगों के पूर्वज मूल्हन दीक्षित शास्त्र के साथ ‘शस्त्र विद्या’ में पारंगत और एक कुशल योद्धा भी थे। सन् 1192 में कन्नौज के राजा गोविन्दचंद्र के उत्तराधिकारी गहडवाल नरेश ने मूल्हन दीक्षित को 700 गांवों की सामंती देकर उन्हें राजा की उपाधि दी थी। लेकिन बड़े भाई मुनि दीक्षित की रुचि कर्मकांड और धार्मिक गतिविधियों में ज्यादा थी इसलिए उन्होंने एक पुरोहित का तपस्वी जीवन चुना। उनके वंशज बलिया नगवां गांव में बसे। गौरतलब है कि ‘मंगल’ पांडे बलिया के ‘नगवा’ गांव के निवासी थे और उनके पूर्वज ‘मुनि दीक्षित’ किनवारों के पूर्वज ‘मूल्हन दीक्षित’ के बड़े भाई थे। पंडित दुबरी राय जी के लेखो में पढने को मिलता है :
"मुनि दिक्षित के नगवा पाण्डे ,मूल्हन केर भये किनवार।" तो वहीं पंडित देवनंदन जी ने भी अपनी पुस्तक मे कहा है : "मुनि कुल पाण्डे जगत कहाए , मूल्हन के किनवार कहाए।"
किनवारों के पुरोहित जो नगवाँ पाण्डे कहलाते हैं, कश्यप गोत्री ही हैं और उन लोगों में यह प्रसिद्ध हैं एवं उनकी वंशावलियों में भी लिखा हैं कि वे और किनवार दोनों भाई हैं। एक भाई का वंश यजमान हुआ और दूसरे का पुरोहित। स्वामी सहजानंद सरस्वती ने अपनी पुस्तक ‘ब्रह्मर्शी वंश विस्तार’ में भी इस बात की चर्चा करते हुए लिखा है:
"किनवारों के पुरोहित जो नगवाँ पाण्डे कहलाते हैं, काश्यप गोत्री ही हैं और उन लोगों में यह प्रसिद्ध हैं एवं उनकी वंशावलियों में भी लिखा हैं कि वे और किनवार दोनों भाई हैं। एक भाई का वंश यजमान हुआ और दूसरे का पुरोहित।"

Saturday, April 18, 2015

रुस्तम-ए-हिंद


हिंद केसरी मंगला राय


पूरनमासी के चांद की तरह शांत और निश्छल, सागर से भी गहरे, आकाश से भी ज्यादा तेजस्वी, कुश्ती के प्राणतत्व और ख्यातिलब्ध पहलवान मंगला राय ने देश में वो ऊंचा कीर्तिमान स्थापित किया, जनपद गाजीपुर और उत्तर प्रदेश को वो गौरव प्रदान किया जिसकी न तो पुनरावृत्ति संभव है और ना ही विस्मृत किया जाना। गाजीपुर और उत्तर प्रदेश की इस अद्भुत शख्सियत का जन्म पावन गंगा की गोद और उसके प्रसाद स्वरूप करइल की माटी में हुआ था। गौरतलब है कि कुश्ती के क्षेत्र में ऊंचा मकाम हासिल करने वाले कमार, आमिर फत्ते, हरी नारायण सिंह, हनुमान पांडे और राजनारायण राय जैसे पहलवानों का जन्म भी गाजीपुर की धरती पर ही हुआ था जिन्होंने अपनी कुश्ती-कला और प्रतिभा से राष्ट्र को गौरवान्वित किया।
गाजीपुर में विजयदशमी का पर्व विशेष उल्लास से मनाया जाता है। इसी दिन भगवान राम ने रावण की आसुरी शक्तियों पर विजय प्राप्त कर सत्य और मर्यादा की पताका फहराई थी। इस दिन गाजीपुर में लोग अपने दैनन्दिन कार्यों से अवकाश लेकर एक दूसरे के घर या दरवाजे पर शिष्टाचार मुलाकात या अभिवादन के लिए जाते हैं। अपने साहस, ऊर्जा और पराक्रम से भारत में कुश्ती के क्षेत्र में नया कीर्तिमान स्थापित करने वाले मंगला राय से मुलाकात करने और संवाद के लिए मैने इसी अवसर को जानबूझकर चुना।

गंगा के हरे-भरे किनारो से होते हुए मैं मुझे उस गांव तक पहुंचना था। ये पूरा इलाका अत्यन्त उपजाऊ और यहां के निवासी समृद्ध थे। विजयदशमी के दिन जब शाम का धुंधलका छाने को था मैने मंगला राय को अपने दरवाजे पर एक चारपाई पर लेटे दिनमान पत्रिका पढ़ते पाया। मुझे देखते ही वो चारपाई से उठ खड़े हुए और मेरा हालचाल पूछा। फिर शुरू हुई हमारी बातचीत।

मैं ये देखकर आश्चर्यचकित था कि उम्रदराज होने के बावजूद वो पूरी तरह से फिट और मजबूत कदकाठी के दिख रहे थे। उनके चेहरे पर ढलती उम्र का नामोनिशान तक नहीं था। पतली कमर, चौड़ा सीना, फौलादी जिस्म, महान कीर्तिमानों से दपदपाता हुआ चेहरा मानो अभी भी चुनौती दे रहा था कि है कोई मेरी जोड़ का पहलवान इस देश में?


कुश्ती कला के महारथी मंगला राय का जन्म गाजीपुर जनपद के जोगा मुसाहिब गांव में सन् 1916 के क्वार महीने में हुआ था। उनके पिता का नाम रामचंद्र राय था। रामचंद्र राय और उनके छोटे भाई राधा राय अपने जमाने के मशहूर पहलवान थे। उन्ही की तरह मंगला राय और उनके छोटे भाई कमला राय ने भी कुश्ती में काफी नाम और यश प्राप्त किया। रामचंद्र राय और राधा राय दोनों अपने जवानी के दिनों में जीविकोपार्जन के चलते म्यामार (बर्मा) के रंगून में रहते थे जहा दोनों एक अखाड़े में रोजाना रियाज और कसरत करते थे। दोनो भाइयों में राधा राय ज्यादा कुशल पहलवान थे और उन्होंने ही अपने दोनों भतीजों को कुश्ती की पहली तालीम दी और दाव-पेंच के गुर सिखाए।

महाबली मुस्तफा के धूल चाटते ही
बदल गया इतिहास 

मैने मंगला राय जी से पूछा कि कब उन्होंने अखाड़े में कुश्ती लड़नी शुरू की और कब उन्होंने प्रतिद्वंद्वियों को ललकारने की शुरुआत की। उन्होंने जवाब दिया कि जब वो सोलह साल के थे तब अखाड़े मे अभ्यास करना शुरू कर दिया था। लेकिन पहली प्रतियोगिता में उन्होंने तब भाग लिया जब वो सत्रह साल के हो गए। यानी साल 1933 में पहली बार मंगला राय जी ने अपने मुकाबले में खड़े दूसरे पहलवान के खिलाफ ताल ठोंकी थी। लेकिन वो हाथ उन्ही पहलवानों से मिलाते थे जिनका जिस्म उन्ही की तरह फौलादी था। सौभाग्य से बनारस के बभनपुरा (जाल्हूपुर) के मशहूर पहलवान शिवमूरत तिवारी भी उन दिनों वर्मा की राजधानी ‘रंगून’ में ही रहते थे। तिवारी जी ने अपने इस शागिर्द को चीनी और जापानी पहलवानों के कई पेंचीदा दांव सिखाए। कुछ साल बाद मंगला राय जी अपने छोटे भाई कमला राय के साथ स्वदेश वापस लौट आए और अपने गांव जोगा मुसाहिब में ही रियाज करना शुरू कर दिया।

बचपन से ही उन दोनों भाइयों को उनके पिता और चाचा ने सादगी का ऐसा पाठ पढाया कि जीवन पर्यन्त अभिमान उनके आस-पास भी नहीं फटक पाया। साफ-सफाई उन्हे इस कदर पसंद थी कि उनके कपड़ों पर एक छोटा सा दाग भी नहीं पाया जा सकता था। लेकिन उनके व्यक्तित्व की सबसे बड़ी खासियत थी मानव मात्र के प्रति उनकी उदारता। राय साहब अपने साथ रहने वाले पहलवानों के भोजन और अन्य दूसरे खर्चों को खुद वहन करते थे।।  

लेकिन सच्चाई ये भी है कि मंगला राय जी को अपने घर और परिवार के साथ समय गुजारने का समय लंबे समय तक नहीं मिला। किसी न किसी को उनके समय की दरकार लगातार रहती थी। रंगून में रहते हुए सिंगापुर, मलेशिया, इंडोनेशिया, चीन और जापान के पहलवानों पर लगातार मिली जीतों के चलते वो इतने मशहूर हो चले थे कि गांव लौटने पर उनकी एक झलक पाने के लिए दूरदराज और आस-पास के गांवों के लोगों की उनके दरवाजे और गांव के अखाड़े पर लागातार भीड़ लगी रहती थी। उनके प्रशंसकों में पड़ोस के गोड़उर गांव के धर्मदेव पांडे भी शामिल थे। पांडेजी को कुश्ती से बेहद लगाव था। पांडे जी मंगला राय के पिता रामचंद्र राय से एक दिन मिलने कुछ उसी अंदाज में आए जिस अंदाज में राजा दशरथ के पास ऋषि विश्वामित्र पहुंचे थे और उन्होंने राम-लक्ष्मण दोंनों भाइयों को अपने आश्रम में शिक्षा प्राप्त करने के लिए मांग लिया। राय साहब के पिताजी पांडेजी की बात को मना नहीं कर सके और मंगला राय-कमला राय दोनो भाई गोड़उर आ गए। लेकिन वहां भी अखाड़े में रियाज करते और खुश्ती लड़ते दोनों भाइयों को देखने वालों का हुजूम लगा रहता था। दोनों पहलवानों की कदकाठी, फौलादी जिस्म, उनके दांव और बचाव के बाद तेज वार को देखकर लोग दांतो तले उंगली दबा लिया करते थे।
गंगा के तट पर रहना, गंगा स्नान करना और कुछ समय तक एकांत में चिंतन-मनन करना मंगला राय जी का प्रिय शगल था। लेकिन इन सबके बीच एक खास चीज और थी जो उन्हे दूसरे पहलवानों से अलग करती थी। जहां दूसरे पहलवान अखाड़े में समय बिताने के बाद भोजन-नाश्ता करके दिन भर खर्राटे भरते थे वहीं मंगला राय जी को पढ़ने-लिखने से काफी लगाव था। अखाड़े में अभ्यास के बाद हर समय कोई न कोई पुस्तक उनके हाथ में जरूर रहती थी।
मंगला राय की यश और कीर्ति लगातार फैल रही थी। उन्ही दिनों नारायणपुर गांव के लोग  मंगला राय जी के पास अपनी विनती लेकर पहुंचे। नारायणपुर के लोग चाहते थे कि राय साहब उनके गांव में रहकर अभ्यास करें। लेकिन राय साहब को अब एक और दूसरे गांव में जाकर रहना मंजूर नहीं था। काफी दिनों तक मान-मनौव्वल का सिलसिला चला। फिर नारायणपुर के लोगों ने एक ही कुल और खानदान ‘किनवार वंश’ की कसम रखी। इसके बाद तो सरल स्वभाव के राय साहब को उनकी बात माननी ही थी। फिर क्या था आनन-फानन में गंगा के किनार एक बगीचे में मंगला राय जी के लिए अखाड़ा बनवाया गया और उनकी दैनिक जरूरतों को पूरा करने का ठोस बंदोबस्त भी हुआ। गौरतलब है कि इस अखाड़े के उस पार ही ऋषि विश्वामित्र का अति प्रचीन आश्रम भी है। यहां रहते हुए बाबू मंगला राय जी ने अपनी कुश्ती-कला को और निखारा। अब वो प्रतिदिन बीस से पच्चीस पहलवानों से तीन-तीन बार कुश्ती लड़ते थे। इन पहलवानों में दरभंगा के दुखराम, आजमगढ़ के सुखदेव, मथुरा के मोहन चौबे, राय साहब के छोटे भाई कमला राय, ब्रह्मचारी राय, मथुरा राय और बालेश्वर पहलवान शामिल थे। ये सभी पहलवान अपने घर-परिवार से दूर कुश्ती सीखने के लिए मंगला राय के साथ ही रहते थे और इन सभी का खर्च भी राय साहब ही उठाते थे।
मंगला राय जी को शुरुआती प्रसिद्धि तभी मिल गई थी जब वो रंगून से अपने वतन वापस लौट कर आए थे। वापस आते ही उन्होंने उत्तर भारत के मशहूर पहलवान मुस्तफा हुसैन को अखाड़े में ललकारा। इलाहाबाद में हुई इस कुश्ती में मुस्तफा ने इस नौजवान को शुरु में हल्के में लिया लेकिन जब इस नौजवान ने जब मुस्तफा के खतरनाक दांव को काटकर अपना प्रिय दांव ‘टांग’ और ‘बहराली’ का प्रहार किया तो महाबली मुस्तफा भहराकर चारो खाने चित हो गया। दर्शकों को सांप सूंघ गया। किसी को अपनी आंखो पर यकीन ही नहीं हो रहा था। लेकिन राय साहब ने तो संयुक्त प्रांत में कुश्ती का इतिहास पलट दिया था। भारतीय कुश्ती में एक नए सितारे ने रोशनी बिखेर दी थी। मंगला राय की प्रसिद्धि जंगल की आग की तरह फैल गई। नतीजा ये हुआ कि बत्तीस साल के मंगला राय को साल भर के भीतर लगातार 100 कुश्तियां लड़नी पड़ी। महाबली मुस्तफा को पटकने के बाद  महामल्ल मंगला राय से हर तीसरे-चौथे रोज कोई न कोई पहलवान भिड़कर जोर आजमाइश करना चाहता था। सिलसिला लंबा चला लेकिन लगातार धूल चाटने के बाद उत्तर भारत के पहलवानों का हौसला पस्त हो गया। इसके बाद पटियाला,पंजाब के रुस्तम-ए-हिंद केसर सिंह चीमा ने मंगला राय से अखाड़े में हाथ मिलाया। दोनों महामल्ल सूरमा एक दूसरे से भिड़ गए। अखाड़े की दहलीज थरथराने लगी। लोगों की सांसे थम गईं। दोनो भीमकाय योद्धाओं को समा पाने में वो अखाड़ा छोटा पड़ने लगा। दोनों ताल ठोंकते तो बादल की गड़गड़ाहट फीकी पड़ने लगती। कोई नतीजा नहीं निकला और दंगल बराबरी पर छूट गया। मंगल राय जी ने बाद में कहा था कि ये कुश्ती गंगा के किनारे खुले रेत में होनी चाहिए तभी इसका कोई फैसला हो पाएगा। लेकिन बाद में बहुत कम लोग मंगला राय जी को चुनौती देने की हिम्मत जुटा पाए।
मंगला राय जी प्रतिदिन जो अभ्यास करते थे उसके बारे में सुनकर ही कई पहलवानों का कलेजा कांप जाता था। खुद राय साहब के मुताबिक वो रोजाना चार हजार बैठकें और ढाई हजार दंड लगाते थे। इसके बाद वो 25 धुरंधरों से तीन-तीन बार कुश्ती लड़ते थे। बाद में दौड़ने रस्सी चढ़ने और मुगदर भांजने की कसरतें वो अलग से करते थे। इतना सुनकर भला कौन पहलवान उनसे हाथ मिलाने का साहस कर पाता। 6 फीट लंबे 131 किलो वजनी भीमकाय कदकाठी के बावजूद मंगला राय जी पूरे सात्विक और शाकाहारी व्यक्ति थे। उनके आहार में आधा किलो घी, आठ लीटर दूध और एक किलो बादाम शामिल था। 
मंगला राय का मानना था कि गुरु तो कोई भी बन सकता है लेकिन सच्चा गुरु वही है जो अपने शिष्यों को शिक्षा के साथ उनकी देखभाल भी वैसे ही करे जैसे वो अपनी संतान का करता है। और इस मायने में राय साहब एक आदर्श गुरु थे। बाद के दिनों में जब उन्होंने कुश्ती से संन्यास ले लिया तो उनको नौजवान पहलवानों को देखकर ग्लानि होती थी। उनका मानना था कि आज के पहलवान कुश्ती-कला के बुनियादी उसूलों से भटककर फैशनपरस्त हो गए हैं। उनमें सिर्फ नाम और दौलत कमाने की ललक रह गई है। जबकि एक पहलवान का जीवन योगी के मानिंद होना चाहिए। शायद सही थे मंगला राय जी....नमन् !!!    




स्रोत :
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पुस्तक – “द रेसलर्स बॉडी : आईडेंटिटी एंड आईडियोलॉजी इन नॉर्थ इंडिया”
लेखक – जोसफ एस. ऑल्टर
प्रकाशक – कैलिफोर्निया यूनिवर्सिटी प्रेस, बर्कले, संयुक्त राज्य अमेरिका
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Friday, April 17, 2015

किनवार वंश पर 

स्वामी सहजानंद सरस्वती का शोध


किनवार ब्राह्मण भी कान्यकुब्ज काश्यप गोत्री, क्यूना के दीक्षित हैं। इसीलिए इनके विषय में किसी का मत हैं कि ये लोग काशी के पास विशेषकर गाजीपुर में क्यूना से आये, इसीलिए उसी डीह के नाम से क्यूनवार कहलाने लगे और वही शब्द बिगड़कर किनवार हो गया। गाजीपुर जिले में ही इन लोगों के निवास स्थान के पास ही कुण्डेसर ग्राम के पूर्व और वीरपुर, नारायणपुर से पश्चिम-उत्तर ओकिनी नाम की नदी बहती थी, जो अब मिट्टी से पट गयी हैं, केवल उसका थोड़ा सा चिह्न रह गया हैं और कुण्डेसर से नारायणपुर को जाने वाली पक्की सड़क के पश्चिम ही उसी ओकिनी के तट पर अब तक किनवार लोगों का पुराना डीह ऊँचा-सा पड़ा हैं। इसलिए उसी ओकिनी के डीह पर रहने से ये लोग ओकिनीवार कहलाते-कहलाते अब 'ओ' शब्द के काल पाकर छूट जाने से किनवार कहलाने लगे।

यद्यपि किनवार ब्राह्मणों की वंशावली में यह लिखा हुआ हैं कि ये लोग कर्नाटक-पदुमपुर से आये और उस पदुमपुर के विषय में बहुत लोगों ने अन्दाज से बहुत कुछ बक डाला हैं। फिर भी ठीक पता वे न लगा सके और यद्यपि वह पदुमपुर कर्नाटक देश और केरल देश की सरहद पर केरल देश का एक खण्ड हैं, इस बात को अभी प्रमाणित करेंगे, तथापि किनवार ब्राह्मण प्रथम के कान्यकुब्ज ब्राह्मण ही हैं, न कि केरल देशीय ब्राह्मण। यह बात इनकी प्राचीन वीरता और व्यवहार-आचारों से सिद्ध हैं। यद्यपि कर्नाटक-पदुमपुर से ये लोग आये, इस विषय में कुछ विशेष प्रमाण या कारण नहीं मिलता। क्योंकि दक्षिण में ऐसी भगेड़ न थी जैसी कन्नौज वगैरह देशों में थी। इसीलिए इन देशों में दक्षिण देश के ब्राह्मण प्राय: नहीं पाये जाते। तथापि यदि वहाँ से ही किनवार ब्राह्मणों का आना मान भी ले तो भी ये लोग वहाँ भी कान्यकुब्ज देश से ही गये थे और फिर किसी कारणवंश हटकर इसी देश में चले आये। कान्यकुब्ज देश से केरल देश या उसके पदुमपुर स्थान में ब्राह्मणों के जाने और वहाँ से आने की बात 'केरल उत्पत्ति' नामक ग्रन्थ में लिखी हुई हैं। यह ग्रन्थ मालाबारी भाषा में लिखा गया था और पीछे से उसका अनुवाद फारसी में हुआ था, जिसे मिस्टर जोनाथन डुनकन' (Jonathan Duncn) ने 1793 ई. में अंग्रेजी में अनुवादित किया। यह सब पूर्वोक्त बातें एशियाटिक रिसर्चेज (Asiatic Researches) नामक अंग्रेजी पुस्तक में लिखी गयी हैं, जो सन् 1801 ई. में छपी थी। उस ग्रन्थ के 56वें पृष्ठ में मालाबार देश के प्राचीन विवरण को लिखते हुए उसी सम्बन्ध में ये बातें लिखी गयी हैं। उस ग्रन्थ का कुछ अंश नीचे उध्दृत किया जाता हैं, जिससे पूर्वोक्त बातों का थोड़ा-सा पता लग जायेगा :
In the book called Kerul-oodputteeor the emerging of the country of Kerul (of which during my stay at Calicut in the year 1793, I made the best translation into English in my power, through the medium of a version first rendered into Persian, under my own inspection from the Malabarie copy procured from one of the Rajahs of Zamorin’s family), the origin of that coast is ascribed to the piety or penitence of Puresuram or Pruseram (one of the incarntions of Vishnu), who stung with remorse for the blood he had so profusely shed in overcoming the Rajahs of the Kshatery tribe, applied to Varuna, the God of the ocean, to supply him with a tract of ground to bestow on the Brahmans; and Varuna accordingly having withdrawn his waters from the Gowkern (a hill in the vicinity of Mangalore) to Cape Comorin, this trip of territory has, from its situation, as lying along the foot of the Sukhien (by the Europeans called the Ghaut) range of mountains, acquired the name of Mulyalum (i.e, skirting at the bottom of the hills), a term that may have been shortened into Maliyam or Maleam, whence are also probably its common names of Mulievar and Malabar; all of whcih Purseram is firmly believed, by its native Hindus inhabitants, to have parcelled out among different tribes of Brahmans, and to have directed that the entire produce of the soil should be appropricated to their
maintenance and towards the edifications of temples, and for the supports of divine worship; whence it still continues to be distinguished in their writing by term of Kerm-bhoomy or ‘the Land of good works for the expiation of sin. The country thus obtained from the ocean, is represented to have remained long in a marshy and scarcely habitable state; in so much, that the first occupants, whom Purseram is said to have brought into it from the eastern and even the northern part of India, again abandoned and it, being more especially scared by the multitude of serpents with which the mud has then abounded, and to which numerous accidents are ascribed. Until Purseram taught the inhabitants to propitate these animal, by introducing the worship of them, and of their images, which became from that period objects of adoration.
In manuscript account of Malabar that I have seen and which is ascribed to a Bishop of Virpoli, (the seat of a famous Roman Catholic seminary near Coachin), he observes, that by the accounts of the learned natives of the Coast, it is little more than 2300 years since the sca came up to the foot of the Sukhien or Ghaut mountains; and that once did so he thinks extremely probable from the nature of and the quantity of land, oyster-shells and other fragments, met with in making deep excavations.
The country of Malyalum was according to the Kerul-oodputtee, afterwards divided into the following Tookrees or divisions.
1st. from Gowkern, already mentioned, to the Perumbura river, was Called the Tooroo or Tnuru Rauje.
2nd. from the Perumbura to Poodumputtum, was called the Moshak Rauje.
3rd. from Poodum or Poodumputtum, to the limits of Kunety was catled the Kerul or Keril Rauje and as the principal seat of the ancient government was fixed in this middle division of Malabar. Its name prevailed over and was in course of time under stood in a general sense to comprehend the three others.
4th. from Kunety to Kunea Loomary or Cape Comorin was called the Koop Rajue.
However this may he, according to the book above quoted, the Brahmans appear to have first set up and for some time maintained, a fort of republican or aristocratical government, under two or three principal chiefs, elected to administer the government, which was thus carried on, till, on jealousies arising among themselves, the great body of the Brahman landholders had recourse to foreign assisstance, which terminated either by conquest or coverntion in their receing to rule over them a Permal, or Chei Governor from the Prince of the neighbouring country of Choldesh (a part of the Southern Cornatic), this succession of viceroys was changed and relived every twelve years till at length one of those officers named Sheoram or Shermanoo Permaloo, and by others called Cheruma Perumal appears to have rendered himself so popular during his government, that at expiration of its term he was enabled, by the encouragement of those over whom his delegated sway had extended to confirm his own authority, and to set at defience that of his late soverign, the Prince of the Choldesh, who is known in their book by the name of Rajah Kishan Rao, and who having sent an army to Malabar with a view to recover his authority, is statated to havebeen successfully withstood by Shermanoo and the Malabarians; an event which is supposed to have happened about 1000 years anterior to the present period, and is otherwise worthy of notice.
इसका भावार्थ यह हैं कि 'केरल-उत्पत्ति नामक पुस्तक में (जिसका 1793 ई. में कालीकट में अपने रहने के समय मैंने यथाशक्ति अंग्रेजी में उत्तम अनुवाद उसके फारसी मंभ अनुवादित उस ग्रन्थ से किया जो प्रथम मालाबारी भाषा की पुस्तक से मेरे सामने लिखा गया था, और जो मालाबारी भाषा की पुस्तक जमोरिन वंशज एक राजा के यहाँ मिली थी) मालाबार किनारे की उत्पत्ति परशुराम (जो कि विष्णु के अवतारों में से थे) के उस प्रायश्चित के कारण बताई गयी हैं, जो उन्होंने क्षत्रिय राजाओं के नाश के लिए खून बहाने के शोक से किया था और जिसके लिए समुद्रपति (देवता) वरुण से यह प्रार्थना की कि उन्हें वे थोड़ी सी भूमि ब्राह्मणों को दान करने के लिए दे। तदनुसार वरुणदेव ने मंगलोर के समीपवर्ती गोकर्ण पर्वत से कुमारी अन्तरीप तक का जल हटा लिया और इस प्रकार वह भूखण्ड सुखेन (घाट) पर्वत के मूल में रहने से मूल्यलम कहलाया, जिसका अर्थ यह होता हैं कि 'पर्वत की जड़ में निकला हुआ' और सम्भव हैं कि यही शब्द संक्षिप्त होकर 'मलियम' हो गया हो और इसी से सम्भवत: इसके साधारण नाम मालेबार और मालाबार पड़े हों। इसके निवासी हिन्दुओं का यह दृढ़ विश्वास हैं कि इस सम्पूर्ण भू-भाग को परशुरामजी ने वहाँ की भिन्न-भिन्न ब्राह्मण जातियों में विभक्त कर दिया था और उनको यह शिक्षा दी थी कि इस भूमि की सम्पूर्ण पैदावार को वे लोग अपने पालन, मन्दिरों की मरम्मत और देवपूजाओं में खर्च किया करें। इसलिए उसी समय से इस भूमि को वे लोग अपने कागजों में 'कर्मभूमि' (अर्थात् पाप के प्रायश्चित के लिए सत्कार्य करने की भूमि) लिखने लगे और अब तक वैसा ही करते हैं। इस प्रकार जो देश समुद्र से मिला वह बहुत दिनों तक दलदल से पूर्ण था, जिसमें लोग कठिनता से निवास कर सकते थे। उसकी ऐसी दशा थी कि जिन प्रथम के ब्राह्मणों को परशुरामजी ने वहाँ भारतवर्ष के उत्तर और पूर्व भाग से लाकर बसाया था, उन लोगों ने फिर उसे छोड़ दिया। क्योंकि उस समय उसकी कीचड़ में रहने वाले बहुत से सर्पों से उन्हें बहुत भय हुआ और बहुत से ब्राह्मण उनसे मर भी गये। जब तक कि ये फिर परशुराम ने वहाँ के निवासियों को उन सर्पों और उनकी मूर्तियों की पूजा द्वारा उन्हें प्रसन्न करने की शिक्षा न दी तब तक यह बात रही और वह पूजा उस समय से होने लगी। मालाबार के एक प्राचीन लेख में, जिसे मैंने देखा हैं और जो विरापोली (कोचीन के निकट रोमन कैथोलिक पाठशाले की जगह) क़े एक बिशप (पादरी) के पास था, यह लिखा हुआ बतलाया जाता हैं कि पढ़े-लिखे मालाबारियों के कथन से कुछ अधिक 2300 वर्षों से समुद्र घाट के पहाड़ों की जड़ में नहीं आया हैं और यह बात वहाँ की भूमि के विस्तार और उन सीप या घोंघे वगैरह के देखने से बिलकुल ही सत्य प्रतीत होती हैं, जो खोदने से भूगर्भ में पाये जाते हैं। 'केरल उत्पत्ति' पुस्तक के अनुसार मलयालम (मालाबार) देश पीछे से चार भागों या टुकड़ों में विभक्त किया गया। जिनमें से प्रथम भाग, जो गोकर्ण से परम्बरा नदी तक था, 'तूरू' राज्य कहलाया। दूसरा, जो परम्बरा नदी से पदमपुत्ताम (पदमपुर) तक था, 'मशक' राज्य कहलाया। तीसरा, जो पदम या पदमपुत्ताम से कुनटी की सीमा तक था 'केरल' राज्य कहलाया और चूँकि पुरानी राजधनी मालाबार के इसी मध्य भाग में थी इसलिए इसी का नाम चारों ओर फैल गया और कुछ दिन बाद लोग शेष तीन खण्डों के सहित सबको सामान्यत: 'केरल' ही समझने लगे। और चौथा भाग, जो कुनटी से कुमारी अन्तरीप तक था 'कूप' राज्य कहलाता था।
अस्तु जो कुछ भी हो। पूर्वोक्त पुस्तक (केरल-उत्पत्ति) के अनुसार पहले पहल ब्राह्मणों ने राज्य-
प्रबन्ध के लिए चुने गये दो या तीन सरदारों के अधीन प्रजा-सत्ताक राज्य प्रबन्ध चलाया और उस दिन तक उसे कायम रखा जब कि परस्पर द्वेष के कारण अधिकांश जमींदार ब्राह्मण अन्य देशीयों से सहायता की बातचीत करने लगे और उनकी समाप्ति विजय या परस्पर सुलह से हो गयी। जिसमें उन लोगों के ऊपर शासन करने के लिए एक चीफ गवर्नर पड़ोस के चोल देश (कर्नाटक के दक्षिण भाग) के शहजादे की तरफ से नियत किया गया। इन वाइसरायों (चीफ गवर्नरों) की तबदीली हर बारहवें बरस होती हुई उस समय तक चली गयी जब कि उन्हीं अफसरों में एक ने, जिसका नाम शिवराम या शरमनू परमलू था, अपने को उन ब्राह्मणों की दृष्टि में अपने प्रबन्ध काल में ही ऐसा प्रेमपत्र बनाया कि जब उसके शासन काल का अन्त आया तो जिनके ऊपर वह राज्य करता था उनकी सहायता से अधिकार को दृढ़ बनाने में समर्थ हुआ और चोल देश के राजा के अधिकार को हटा दिया। उस राजा का नाम किशनराव था। उस राजा ने अपने अधिकार को फिर से प्राप्त करने के लिए फौज भेजी। परन्तु कहा जाता हैं कि शरमनू और मालाबारियों ने उसे हरा दिया। बात आज (1793) से लगभग 1000 वर्ष हुई और ध्यान देने योग्य हैं।''
इस पूर्वोक्त कथन से स्पष्ट हैं कि कर्नाटक से मिला हुआ और उसकी सीमा पर ही पदमपुर स्थित हैं। इसी से किनवार ब्राह्मणों की वंशावली ने उसे पदमपुर कर्नाटक लिखा हैं। यह भी स्पष्ट हैं कि वहाँ जो ब्राह्मण लाये जाकर उस देश के राजा या जमींदार बनाये गये वे उत्तर-पूर्व भारत अर्थात् कान्यकुब्ज देश से ही लाये गये। यह बात सत्य भी हैं, क्योंकि कान्यकुब्ज देश में बहुत प्राचीन काल से ही ब्राह्मणों का निवास चला आता हैं। इसलिए इन किनवार ब्राह्मणों का वहाँ से आना मान भी लिया जाये तो भी ये लोग वास्तव में कान्यकुब्ज ही हैं। और यदि पदमपुर से आये भी होंगे तो, या तो जैसा कि ऊपर लिखा हैं कि सर्पों के भय से बहुत से ब्राह्मण लोग भाग गये, उसके अनुसार लगभग 2300 वर्षों से ही वहाँ से आये अथवा जो युद्ध आज से 1100 वर्ष पूर्व कर्नाटक देश के राजा और मालाबारियों एवं शिवराम के बीच हुआ था उसमें ही हटकर चले आये। क्योंकि शिवराम या उन लोगों की विजय हुई सही, तथापि एक राजा के विरुद्ध लड़ने से उनको बहुत कष्ट भोगना पड़ा और बहुत ह्स हो गया। जिससे शिवराम (जिसके लिए युद्ध ठाना गया था) भी दु:खी होकर युद्ध के बाद कहीं अन्यत्रा चला गया। यह बात आगे चलकर उसी 'केरल उत्पत्ति' में लिखी गयी हैं और चूँकि वे लोग इसी देश से गये थे, अत: फिर यहीं चले आये। युद्ध के समय का आना ही विशेष विश्वसनीय हो सकता हैं, क्योंकि उन दिनों सभी देशों में गड़बड़ मच रही थी और लोग ईधर-उधर भाग रहे थे। जो कुछ भी हो, चाहे किनवार ब्राह्मण पदुमपुर से आये अथवा कन्नौज से ही, परन्तु ये लोग कान्यकुब्ज ब्राह्मण, दीक्षित और काश्यप गोत्री हैं और इस समय भूमिहार ब्राह्मण कहे जाते हैं।
किनवार क्षत्रियों का जो केवल बलिया के छत्ता और सहतवार आदि गाँवों में पाये जाते हैं, विवरण प्रथम ही सुना चुके हैं और जहाँ पर किनवार ब्राह्मण गाजीपुर के मुहम्मदाबाद परगने में भरे पड़े हुए हैं और वीरपुर, नारायणपुर, कुण्डेसर, भरौली, विश्वम्भरपुर, परसा, लट्ठूडीह गोढ़उर और करीमुद्दीनपुर आदि उनके बड़े-बड़े ग्राम हैं। वहाँ उनसे पृथक् दो या चार गाँवों में रहने वाले क्षत्रियों की बात वही हो सकती हैं जैसी कि कही जा चुकी हैं, और वही बात सन् 1880-85 ई. के गाजीपुर की सेट्लमेण्ट रिपोर्ट में उस समय के कलेक्टर विलियम इरविन (William Irvine) ने यों लिखी हैं :
Amog Dichhit had three sons, kulkal Rai, Baijal Rai and Mahipal Rai. As they thought that they could not perform all the religious ceremonies required, they began to call themselves Rai, Kulkal Rai, without the consent of his brothers, married the daughter of a chhatri in Pargana Panchotor, and therefore he was excluded from his caste of Brahman; but the two brothers, having taken pity on him, gave him some property and the village Chhata in the Ballia district; as is recorded in the following verse:
Bijal o mahipal bhum adha kar lin;
Jeth putra Kulkal tahiko chhata din.—Page 33.
इसका मर्मानुवाद यह हैं कि 'किनवारों के पूर्वज अमोघ दीक्षित के कलकल राय, बैजल राय और महीपाल राय तीन पुत्र थे। उन्होंने समझा था कि हम लोग पुरोहिती आदि नहीं करवा सकते हैं, इसलिए अपने को दीक्षित की जगह राय कहने लगे। कलकल राय ने बिना अपने भाइयों की सम्मति के ही पचोतर परगने के किसी क्षत्रिय की पुत्री से ब्याह कर लिया, इसलिए वे अपनी ब्राह्मण जाति से च्युत कर दिये गये। परन्तु दोनों छोटे भाईयों ने उनके ऊपर दया करके कुछ धन और बलिया जिले का छाता गाँव उन्हें दे दिया। जैसी कि कहावत हैं कि ''बैजल और महिपाल भुइं आधा करि लीन। जेठ पुत्र कलकल, ताहि को छाता दीन''। किनवारों के पुरोहित जो नगवाँ पाण्डे कहलाते हैं, काश्यप गोत्री ही हैं और उन लोगों में यह प्रसिद्ध हैं एवं उनकी वंशावलियों में भी लिखा हैं कि वे और किनवार दोनों भाई हैं। एक भाई का वंश यजमान हुआ और दूसरे का पुरोहित।